राजनीतिक दलों की नहीं, स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई है बंगाल में चुनावी हिंसा
आज बंगाल के पंचायत चुनाव में हिंसा,हत्या और बमों के ढेर की चर्चा हर तरफ है,सुनकर आरोप लगाया जा रहा है कि ममता सरकार की पनाह में इन घटनाओं को बढ़ावा दिया गया है। ये थ्रेड सिर्फ मेरे अनुभव और आंखों देखी पर लिखने की कोशिश की है,पहली बात पश्चिम बंगाल आकंठ हिंसक राजनीति में आज से नहीं 6 दशक से पहले से डूबा रहा है जिसकी नींव वाममोर्चा सरकार के दौर में ही रख दी गई थी,2011 में ममता बनर्जी की सरकार आने के बाद जिस सलीके से माओवादीओ का खात्मा कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा गया वहीं यहां के जमीन पर पनप रही हिंसक राजनीति को थामने की जगह रोपा गया। यही कारण है कि आज भी चुनावी दौर में यहां हिंसा हत्या जमकर होती हैं क्योंकि बंगाल में हिंसा कल्चर कहे या बम कल्चर परंपरा के जैसे चली आ रही है
इस पंचायत में भी ये रूप देखने को मिला,कुछ हिंसा को फ्रंट में कवर करते हुए मैंने देखा जिसमें भांगड़ एक है,इसका भी पुराना रक्त रंजित इतिहास रहा है,नेता यहां धौंस और वर्चस्व की लड़ाई में इतने तल्लीन होते है कि लाशों को गिराना इनके लिए बड़ी बात नहीं है क्योंकि यहां पार्टी नहीं बल्कि व्यक्तिविशेष के स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई सामने होती है जिसे पाने के लिए हिंसा बहुत छोटी सी चीज इन्हें लगती हैं जहां लोगों की जान भी जाएं तो पल दो पल का दुख फिर जीत का जश्न मनाया जाता है।
अब बात पुलिस प्रशासन की करें तो लोकतंत्र के इस देश में अगर कोई कहे कि सरकार के मुखर होकर ये काम करते हैं तो इससे बड़ा छलावा दूसरा नहीं होगा...
कुछ आंकड़े भी जरूरी है 2003 में करीब 70 लोगों की जान गई थी। 2008 में 35 से अधिक, 2013 में करीब 39 लोग इस हिंसा की बेदी पर शहीद हुए थे, इस बार आंकड़ा 50 है जिसमें तृणमूल के अधिक लोग मरे है।तो ये कहना कि तृणमूल हिंसा कर रही है तो वो अधूरा सच है, भाजपा, कांग्रेस,लेफ्ट, आईएसएफ भी हिंसा के दंगल में अपने दम के हिसाब से बराबरी का मुकाबला देती आई है।
हिंसा के इतर जो सबसे जरूरी बंगाल की राजनीति में है वो जनता के साथ जमीनी स्तर पर जुड़ना जिसका मुकाबला फिलहाल ममता बनर्जी के साथ कोई करने वाला तैयार नहीं हो पाया है।
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