1984 की काली सुबह, भीड़ ने दी थी निहत्थे को दर्दनाक मौत ! नाम बदला है स्वरूप नहीं...
राजनीति गलियारों से लेकर सोशल मीडिया में इन दिनों लिंचिंग शब्द पर काफी कुछ कहा जा रहा है। मेरे लिए मायने यह नहीं रखता कि इस शब्द का इजाद कब हुआ। महत्वपूर्ण यह है कि सालों से भीड़ द्वारा पिटायी की वजह किसी की मौत का कारण बनी है। गलत नहीं हूं तो लिंचिंग का विस्तारित अर्थ भी यही होता है जहां लोगों की भीड़ या कहे दो से अधिक लोग एक शख्स की जान लेने पर उतारू होता है।
लिंचिंग शब्द ने कोलकाता की एक घटना मेरे जहन में जिंदा कर दिया है। बात 18.03.1984 की है। बंगाल में वामों का लाल पताका बुलंद था। यह वह काला दिन था जिसने लाल पताका और उसकी कानून-व्यवस्था का असल चेहरा लोगों के सामने ला दिया था। आईपीएस विनोद कुमार मेहता उस वक्त डीसी पोर्ट थे। उन्हें आज भी पुलिस तबगे में उनकी साहस के लिए याद किया जाता है। ऐसे साहसी पुलिस ऑफिसर का दुखद अंत हुआ। समाजविरोधियों के झुण्ड ने दौड़ा-दौड़ा कर जान से मार दिया और शव को कैनल में फेंक दिया।
बदमाशों ने वीके मेहता और उनके गार्ड कांस्टेबल पर बम और ईंट फेंकने लगे। घातक हथियारों से हमला किया। दोनों ने पूरे जज्बे के साथ अपराधियों का सामना करते रहे। जब लगा जान खतरे में है तो उन्होंने मस्जिद के पास शरण ली, बदमाशों ने मस्जिद पर भी हमला किया। वीके मेहता ने एक घर में शरण ली लेकिन वे पीछा करते हुए वहां भी पहुंच गये।
वीके मेहता के गार्ड को मीलों घसीटा गया, उसकी आंखें निकाल दी गयी, उसकी रिवॉल्वर छीन कर अंग काट कर उसके शरीर में आग लगा दी। वीके मेहता के साथ भी इतना ही क्रूर व्यवहार किया गया। उन पर धारदार हथियारों से इतनी बार हमला किया कि मौके पर ही उनकी मौत हो गयी। हत्यारों ने उनकी वर्दी और जूते उतारकर शव को कैनल में फेंक दिया जो बाद में कच्चे नाले से बरामद किया गया था।
एक पुलिस ऑफिसर को इस तरह घेर कर जान से मारने की घटना 1984 में घटी।
Comments
Post a Comment