रहस्यों से भरी है नागा साधुओं की दुनिया...खुद करते है अपना ही पिंडदान

हिंदू धर्म में नागा साधुओं के जीवन को काफी कठिन माना गया है। ये शैव परंपरा के अनुयायी होते हैं। नागाओं के 5 गुरु माने गए हैं उनमें भगवान शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और गणेश हैं। इतिहास में जिक्र है कि नागा साधु बनने की प्रक्रिया महाकुंभ के दौरान शुरू हुई। कहते है नागा बनने से पहले ये ब्रह्मचर्य की परीक्षा देते है जिसमें बाल कटवाना और कुंभ में 108 डुबकियां लगाना अनिवार्य है। इसकी सिद्धी के बाद इन्हें महापुरुष दर्जा दिया जाता है।
महापुरुष की उपाधि मिलने के बाद इनके अवधूत बनाने की प्रक्रिया आती है जिसमें ये खुद का श्राद्ध कर अपना ही पिंडदान करते है। फिर आता इनके साधु बनने की परीक्षा होती है जिसमें 24 घंटे तक बिना कपड़ों के अखाड़े के ध्वज के नीचे इन्हें खड़ा रहना होता है तब जाकर इन्हें नागा बनाया जाता है।
नागा साधुओं का नामकरण दीक्षा लेने की जगह के आधार पर होता है। प्रयागराज में दीक्षा लेने नागा कहलाते हैं, हरिद्वार में बर्फानी नागा, उज्जैन में खूनी नागा और नासिक में इन्हें खिचड़िया नागा के नाम से जाना जाता है।
नागा साधु देर रात जंगल के रास्ते यात्रा करते हैं इसलिए ये किसी को दिखाई नहीं देते हैं। नागा साधु एक जगह नहीं रहते इसी कारण इनका स्थाई पता लगाना मुश्किल होता है।

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