आंखें हो नम, होंठों पर मुस्कान, यही बनी औरत की पहचान !
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी...
आधुनिकता बोले या अति आधुनिकता कितने ही आगे बढ़ जाए हम ऊपर लिखी पंक्तियां महिलाओं के जीवन को हमेशा बयां करती रहेंगी।
नाम अलग है, शख्सियत अलग है, पहचान अलग है, जीने के तरीके अलग हैं, तौर सलीके अलग है लेकिन जिम्मेदारियां एक ही है।
जिम्मेदारियों का बोझ कहे या जिम्मेदारियों की जिम्मेदारी उठाने वाली महिलाएं असल में अपनी जिम्मेदारियों को बोझ नहीं कर्तव्य की तरह पूरी करने की क्षमता रखती हैं, फिर वह महज गृहणी हो या घर के बाहर जाकर 24 घंटे तक की नौकरी करने वाली नौकरी पेशा महिला। एक के कंधे पर पूरे घर की जिम्मेदारी होती है तो दूसरे के कंधे पर घर और ऑफिस की दोहरी जिम्मेदारी होती है।
1 मई को हर कोई छुट्टी मनाता है काम से, लेकिन हमारी देश की महिलाएं इस दिन भी काम नहीं छोड़ती, कह सकते हैं कि उनकी डबल ड्यूटी लगती है इस दिन।
विश्व बैंक की 2016 की रिपोर्ट देखें तो देश में 27 फ़ीसदी महिलाएं नौकरी पेशा थी जो 2 साल बाद घटकर 26 फ़ीसदी हो गई। इसका मतलब यह नहीं है कि महिलाओं ने नौकरी छोड़ी बल्कि कई महिलाएं स्वरोजगार में खुद को जोड़ दी। इन महिलाओं में ग्रामीण महिलाओं की संख्या शहरी महिलाओं की तुलना में अधिक पाई गई है। यह तो हुई महिलाओं के स्वावलंबी बनने की तरफ एक सकारात्मक कदम की।
एक दूसरा पहलू भी है इसे चिंताजनक कहा जाए तो गलत ना होगा। आधुनिक हो चुके समाज में आज भी ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्हें ससुराल के दबाव के कारण, पारिवारिक परेशानियों के कारण अपनी नौकरी छोड़नी पड़ गई है। इनमें ऐसी महिलाएं भी है जो उस वक्त अपनी नौकरी छोड़ती है जब सफलता की सीढ़ी उनके सामने होती है...
सफलता सामने हो लक्ष्य दिख रहा हो लेकिन जिम्मेदारियां घर की कदम न बढ़ाने दे, वह पल कैसा हो सकता है यह वह महिला ही बता सकती है जिसने अपने सपनों को टूटते हुए देखा है।
यह मुख्य कारण है जो महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने की कतार में पीछे कर रहे हैं। मर्द और औरत समान है यह कहने की बात है, इसका समर्थन कई मुद्दों में मेरा बिल्कुल नहीं है अगर ऐसा होता तो नहीं है औरत मर्द की हिस्सेदारी 30-70 नहीं 50-50 होती।
महिला घर संभाले तो ग्रहणी है जिसे ताने मिलते हैं करती क्या हो ?
नौकरी करने जाए तो संतुलन बैठाने में पूरी तरह पिसती दिखती है। यह वह वक्त होता है जहां ऑफिस में या घर में सिर्फ देखा जाता है काम समय पर हुआ कि नहीं ? आपने किन परिस्थितियों में घर या ऑफिस का काम पूरा किया उसमें किसी को दिलचस्पी नहीं होती, फर्क नहीं पड़ता।
मरहम लगाने के लिए महिला दिवस के दिन बधाइयां जरूर दे दी जाती है, दूसरे दिन से वही रूटिंग शुरू कर दी जाती है।
ऐसा नहीं है समझ नहीं आता, सब पता है, सब समझते हैं बस खामोश हैं ताकि रिश्ते बने रहे। इन्हे कुछ नहीं चाहिए सिर्फ इतना पूछ लो सब ठीक है ? और यह कह दो मैं हूं ना यकीन मानिए महिलाओं की आंखें अकेले में नम न होगी। वह खुद से सवाल नहीं करेगी हर बार मैं ही गलत क्यों ? ना ही भगवान से प्रार्थना करेंगी अगले जन्म बेटी न जनना
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