भोपाल की वो एक रात आज भी उकेरती है कई सवाल

खता लम्हे ने की सजा सदियों ने चुकाई....

अमेरिका का जापान के हिरोशिमा नागासाकी में परमाणु बम गिराना और भारत में भोपाल की गैस त्रासदी। दोनों त्रासदी में फर्क जमीन आसमान का है लेकिन दर्द लगभग समान है, जो मैं अनुभव करती हूं। मुझे याद है स्कूल की 12वीं क्लास में अंग्रेजी का चैप्टर था हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु हमले का। चैप्टर में पूरी घटना का वर्णन बखूबी किया गया था मानो एक फैंटेसी थी जो बहुत बुरी थी। दूसरे विश्व युद्ध का वर्णन था, अमेरिका की ताकत का बखान था तो जापान के इन दोनों शहरों ने दो परमाणु बम के हमले में क्या सहा था उसका वर्णन इतना जीवंत था मानो आंखों के सामने घटता देख रहे हो। इसी तरह की त्रासदी हमारे देश में भोपाल के लोगों ने भी सही जिसका असर आज तक है। इस घटना के बारे में जो जाना जो समझा वह अखबार के जरिये ही संभव हो पाया। स्कूली किताब में इसे नहीं जोड़ा गया जबकि देश में यह सबसे बड़ी त्रासदी रही। इसके पीछे क्या कारण रहे आखिर क्यों हजारों लोगों को अपनी बलि देनी पड़ी। पी​ढ़ियों को आज तक भुगतना पड़ रहा है। दिसंबर की 3 तारीख हर साल इन सवालों को उकेरती है जबकि जवाब सभी के पास है, किसके शह पर इस त्रासदी को अंजाम दिया गया। गलती भी थी तो क्यों आरोपियों को देश से भगा दिया गया और पीड़ितों को मरने के लिए उनके हाल पर बेबस छोड़ ​दिया गया।

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