ब्राह्मण शंख बजाएगा देखें किधर बढ़ता जाएगा... उत्तर प्रदेश में बिछने लगी चुनावी बिसात
हाल ही में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव ने जितनी सुर्खियां बटोरी उतनी ही चर्चा उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर शुरू हो चुकी है। आबादी के हिसाब से उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है, वहीं मुख्यमंत्री की लोकप्रियता की नजर से योगी महाराज भी किसी से कम नहीं है। बेशक वह प्रदेश की जनता की पहली पसंद बने हो सकते हैं लेकिन बाकी राजनीतिक पार्टियां इस पर चुप कर बैठे यह राजनीति के खेल में परे होने की बात होगी। चुनाव अगले साल है लेकिन राजनीतिक पार्टियों ने चुनावी शतरंज की बिसात बिछाना शुरू कर दिया है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण समीकरण जातियों का है। विशेषकर ब्राह्मणों का, जिस पर सभी दांव लगाए बैठे हैं। अब देखने वाली बात है कि ब्राह्मण किस और जाता है, जिन्हें रिझाने में भाजपा तो लगी ही है बसपा जो 9 सालों से सत्ता के बाहर है वह भी लौट आई है बहन जी ने तो यह तक मान लिया है कि ब्राह्मण उनके लिए प्राइम लिस्ट में है।
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोट करीब 12% है जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार या जीत का सीधा जिम्मेदार माना जाता है। ब्राह्मणों का साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता दिलाता है इतिहास गवाह है इसका।
2017 में ब्राह्मणों का साथ बसपा के हाथ में था। 2012 में ब्राह्मणों ने सपा का साथ दिया और सत्ता अखिलेश के सिरमोर हुई। 2014 में बसपा सपा से खफा ब्राह्मणों ने भाजपा का दामन ऐसा थामा कि वहां कमल खिल गया।
ठाकुरों का वोट भी 8% मायने रखता है। वही मुस्लिम वोट 20.8% है जिस पर भाजपा का फोकस तो ना के बराबर है लेकिन बसपा और सपा के रडार पर ही है। यही कारण है कि भाजपा इस बार पूरी तरह ब्राह्मण और ठाकुरों को अपने खेमे में सुरक्षित रखने पर जुट गई है। यहां तक कि उन 39 सवर्णों को पिछड़ा वर्ग में शामिल कर उन्हें ट्रंप कार्ड की तरह खेलने की तैयारी शुरू हो चुकी है हो सकता है भाजपा का दांव उन पर बैकफायर भी करें क्योंकि कायस्थों को भाजपा का यह कदम उतना रास नहीं आने वाला।
उत्तर प्रदेश में दलित और मुस्लिम का गठजोड़ पुराना है इसलिए बीजेपी हो बसपा हो या सपा सभी के लिए किंग मेकर इस बार ब्राह्मण ही साबित होने वाले हैं।
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