इतिहास... विनाश भी है, उत्थान भी है, बखान भी है, शर्मनाक भी है

इतिहास के पन्नो में युद्ध भी है बुद्ध भी है. राग भी है द्वेष भी है. यह आपकी सोच पर है कि आप अपने इतिहास से क्या सीखते है? क्या लेते हैं...

इतिहास जरिया है अतीत को समझने का उस वक्त की योग्यताएं और कौशल को जानने का। इतिहास को जानने के लिए हमें उस दौर में खुद को ले जाने की जरूरत होती है। आज की विचारधारा के साथ इतिहास की उस वक्त को हम नहीं मान सकते बल्कि उस समय के विचारों को देखकर, पढ़कर या कहें समझ कर हमें आज के परिपेक्ष्य में उसे संतुलित करना होता है न कि आलोचनाओं के जरिए इतिहास के अध्ययन को गलत दिशा में ले जाना। 
जो दावे करते हैं कि इतिहास मुगलों का बखान किए हैं उन्हें असल में इतिहास का अध्ययन करने की आवश्यकता है। सच है कि मुगल और मुसलमानों का बखान हुआ है। सच यह भी है हिंदुओं का महत्व, हिंदू धर्म को बढ़ावा भी इतिहास में दिया गया है अगर ऐसा ना होता तो शायद हमें मौर्य, मराठा, अहोम, चोल, विजयनगर, गुप्त साम्राज्य की जानकारी ना होती। भारतीय इतिहास में गुप्त साम्राज्य को स्वर्ण युग के रूप में देखा गया है। 200 वर्षों के गुप्त साम्राज्य में उत्तर भारत को एक राजनीतिक स्थिरता दी गई है, वहीं पूरे भारत को एक सूत्र में बांधे दिखाया गया है। गुप्त साम्राज्य में ही समुद्रगुप्त के शासनकाल में हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति को जितना बल मिला उसी का नतीजा था कि इस युग में संस्कृत को राजकीय भाषा का सम्मान दिया गया। यह शासन का वह दौर था जहां राजाओं को धर्म का अवतार माना जाता था, धरती पर उन्हें विष्णु का रूप मानते थे। गुप्त सम्राट हिंदू धर्म के समर्थक थे जिसकी वजह से इस दौर में हिंदुओं की चतुर्वर्ण व्यवस्था पर अधिक जोर दिया गया। आज हिंदू धर्म का जो आधार है वह इसी काल की देन है। कहना गलत ना होगा कि धार्मिक दृष्टि से गुप्त काल की मुख्य विशेषता मंदिरों का निर्माण है हिंदू धर्म का पुनरुत्थान है। कुछ इतिहासकारों की मानें तो प्रयाग और बनारस को तीर्थ स्थान इसी काल से मानना शुरू किया गया था। मुगलों ने क्या किया ? कितना विनाश किया? इस पर जोर न देकर हिंदू और हिंदू धर्म को किस कदर इतिहास में दर्ज किया गया इसे बढ़ावा देने की जरूरत है, क्योंकि हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं जिसमें दोनों का ही महत्व समान माना जाता है। अब देश में मुगलों का राज हुआ था लाजमी है विचारधारा वाले इसे भी इतिहास में दर्ज करेंगे लेकिन कुछ ऐसे भी इतिहासकार रहे हैं जिन्होंने इसके इतर इतिहास के कुछ पहलुओं को दिखाने की कोशिश की है जिन का बखान भी अच्छा खासा किया गया है जिसका एक उदाहरण रिक्त साम्राज्य यानी कि हमारे भारतीय इतिहास का स्वर्ण काल है।

Comments

Popular posts from this blog

बेटियां... आंखों का कांटा नहीं, तारा है बेटियां

1984 की काली सुबह, भीड़ ने दी थी निहत्थे को दर्दनाक मौत ! नाम बदला है स्वरूप नहीं...

14 सितंबर तक सिमट गई हिंदी... अंग्रेजियत के हावीपन ने कम की हिंदी की हैसियत !